Thursday, April 3, 2025
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बिहार चुनाव 2025: वक्फ बिल का समर्थन और बिहार में सियासी चालें

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Bihar: बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। वक्फ संशोधन बिल 2025 को लेकर बिहार एनडीए की एकजुटता और नीतीश कुमार की रणनीति आने वाले चुनावों पर गहरा असर डाल सकती है। जेडीयू, टीडीपी, एलजेपी (रामविलास) और हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (HAM) जैसे सहयोगी दलों का वक्फ बिल पर मोदी सरकार को समर्थन देना सियासी समीकरणों को नया मोड़ दे सकता है।

नीतीश कुमार की दुविधा और सियासी संतुलन

नीतीश कुमार के लिए वक्फ संशोधन बिल का समर्थन करना किसी दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। बिहार में मुस्लिम वोट बैंक उनकी राजनीति में अहम भूमिका निभाता है, लेकिन लोकसभा चुनावों में बीजेपी का समर्थन उनके लिए अनिवार्य हो जाता है। इसीलिए उन्होंने वक्फ बिल का समर्थन करते हुए भी उसमें संशोधन की मांग रखी ताकि अल्पसंख्यक समुदाय को भरोसे में रखा जा सके।

नीतीश कुमार के नेतृत्व में जेडीयू ने बिल में तीन प्रमुख संशोधन करवाए:

  1. वक्फ संपत्तियों पर नियंत्रण का अधिकार – राज्य सरकार कलेक्टर से ऊपर के अधिकारी को नियुक्त कर सकती है।
  2. धार्मिक स्थलों की सुरक्षा – पुरानी मस्जिदों, दरगाहों या अन्य धार्मिक स्थलों के स्वरूप से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी।
  3. बिल की प्रभावशीलता – यह कानून पुरानी तारीख से लागू नहीं होगा।

इन संशोधनों के जरिए नीतीश कुमार ने मुस्लिम समुदाय के भीतर अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की कोशिश की है, ताकि वक्फ बिल के समर्थन का नकारात्मक असर कम किया जा सके।

बीजेपी और एनडीए के अंदरूनी समीकरण

बीजेपी को वक्फ संशोधन बिल को पास कराने के लिए अपने सहयोगी दलों के समर्थन की जरूरत थी, जिसे उसने सफलतापूर्वक हासिल कर लिया। टीडीपी, जेडीयू, एलजेपी (रामविलास) और HAM ने व्हिप जारी कर अपने सांसदों को सदन में उपस्थित रहने और सरकार के पक्ष में मतदान करने का निर्देश दिया।

टीडीपी के समर्थन के पीछे भी व्यावहारिक राजनीति है। चंद्रबाबू नायडू जानते हैं कि उन्हें आंध्र प्रदेश में मुस्लिम वोटों की जरूरत है, इसलिए उन्होंने बिल में संशोधन के कुछ सुझाव दिए, जिन्हें केंद्र सरकार ने मान लिया।

वहीं, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी ने भी मोदी सरकार के साथ खड़े होकर बिहार में एनडीए की एकजुटता का संकेत दिया। जीतनराम मांझी ने यहां तक कहा कि जब वक्फ संशोधन बिल पास होगा, उस दिन देश के हर मुसलमान मोदी है तो मुमकिनकहेगा।

मुस्लिम वोट बैंक पर असर और विपक्ष की रणनीति

वक्फ संशोधन बिल को लेकर विपक्षी दल इसका इस्तेमाल एनडीए के खिलाफ करने की कोशिश करेंगे। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस इसे मुस्लिम विरोधी कदम बताकर अपना वोट बैंक मजबूत करने का प्रयास करेंगे।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही इस बिल का विरोध कर चुका है और जेडीयू व टीडीपी जैसे सहयोगी दलों से समर्थन वापस लेने की अपील की है। बिहार में मुस्लिम मतदाता नीतीश कुमार की इस चाल को किस रूप में लेते हैं, यह विधानसभा चुनाव के परिणामों में देखने को मिलेगा।

राजद, कांग्रेस और वामपंथी दल इस मुद्दे को लेकर मुस्लिम समुदाय के बीच संदेश दे सकते हैं कि एनडीए सरकार उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है। राजद नेता तेजस्वी यादव पहले ही यह संकेत दे चुके हैं कि वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण का प्रयास अल्पसंख्यकों के खिलाफ है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025: संभावित समीकरण

वक्फ बिल का समर्थन करने के बाद जेडीयू और बीजेपी के रिश्ते और मजबूत हुए हैं। नीतीश कुमार विधानसभा चुनाव में एनडीए के नेतृत्व में उतरेंगे, लेकिन उनके लिए मुस्लिम वोटों की नाराजगी चिंता का विषय होगी।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बिहार की 17% मुस्लिम आबादी में इस बिल को लेकर असंतोष पनप सकता है। अगर मुस्लिम वोटर जेडीयू से दूर हुए तो राजद और कांग्रेस को इसका फायदा मिल सकता है। हालांकि, नीतीश कुमार ने बिल में संशोधन करवाकर और अपने ट्रैक रिकॉर्ड का हवाला देकर मुस्लिम मतदाताओं को साधने की कोशिश की है।

बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला एनडीए बनाम महागठबंधन के बीच होगा। अगर मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से महागठबंधन की ओर शिफ्ट होते हैं, तो जेडीयू को नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन अगर नीतीश कुमार अपनी छवि को बरकरार रखने में कामयाब होते हैं, तो बीजेपी के समर्थन से एक बार फिर वे मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर सकते हैं।

बिहार चुनाव 2025 में वक्फ बिल एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है। नीतीश कुमार की रणनीति यह सुनिश्चित करने की है कि वे बीजेपी का समर्थन भी बनाए रखें और मुस्लिम समुदाय को भी भरोसे में लें।

यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जेडीयू की यह चाल कामयाब होती है या फिर विपक्ष इस मुद्दे का फायदा उठाकर मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल रहता है। बिहार की राजनीति में अगले कुछ महीनों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं, जो आगामी चुनावों की दिशा तय करेंगे।

 

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