Ranchi : एक ऐसे नेता जिसे भारत रत्न मिलने की घोषणा खुद पीएम मोदी ने की थी। आज वह 97 साल के हो चुके हैं! जी हां लालकृष्ण आडवाणी का कल यानि 8 नवंबर को जन्मदिन था ! वह भारतीय जनता पार्टी के अकेले जीवित नेता हैं जिन्होंने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में अपना सबकुछ झोंक दिया! आज बेशक, वह राजनीति से दूर हों लेकिन वह बीजेपी और जनसंघ की राजनीति के ऐसे पुरोधा हैं जिन्होंने कई पीढ़ियों को राजनीति के कई मानदंड दिये हैं!
1999 का दौर ऐसा दौर था जब आडवाणी की रजामंदी के बगैर सरकार और पार्टी में कोई बड़ा फैसला नहीं होता था..! 2002 के गुजरात दंगों में वाजपेयी चाहते थे कि गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेन्द्र मोदी इस्तीफा दें लेकिन वाजपेयी के खिलाफ जाकर आडवाणी ने उनका इस्तीफा नहीं होने दिया! ये उदाहरण बताते हैं कि आडवाणी ने पार्टी के अंदर अपनी पकड़ कितनी मजबूत बना ली थी। लेकिन आज आडवाणी हाशिये पर हैं उसकी वजह है महत्वाकांक्षाएं! उन्होंने उम्र के उस दौर में प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाएं पाल ली जिसे आरएसएस इजाजत नहीं दे सकता था..! ख्वाहिशें अटल बिहारी के दौर में भी थीं लेकिन अटल की छवि एक सर्वमान्य नेता के रूप में उभरने के बाद उनकी महत्वाकांक्षाओं को पंख नहीं मिल सके। बताया जाता है कि अगर 1991 अगर चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो शायद केन्द्र में बीजेपी की सरकार होती और आडवाणी प्रधानमंत्री बन सकते थे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जनादेश कांग्रेस का मिला और केन्द्र में कांग्रेस की सरकार बन गयी। इसी बीच आडवाणी ने नहीं चाहते हुए भी 1996 के लोकसभा चुनाव से पहले ही अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। उन्हें लगा था कि इससे उनका कद पार्टी और संघ परिवार में और बढ़ेगा और हुआ भी वैसा ही, बस अंतर इतना ही था कि इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने और जन-जन के नेता भी बन गए और आडवाणी पार्टी के नेता बन गए। फिर उसके बाद पीएम बनने का सपना अधूरा ही रह गया। जनसंघ और भाजपा में अटल-आडवाणी की जोड़ी अपने दौर की सबसे विख्यात राजनीतिक जोड़ी थी।
जनसंघ और जनता पार्टी के बाद 1980 में जिस भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का जन्म हुआ था, उसे आम आदमी अटल-आडवाणी की पार्टी के रूप में जाना जानता था। समय बदलता गया, पार्टी का काम चलता रहा। एक समय ऐसा भी आया, जब 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद लोकसभा चुनाव में बीजेपी की जो दुर्गति हुई, वह नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए निराश करने वाली थी। लेकिन न नेता निराश हुए और न ही कार्यकर्ता, क्योंकि अटल बिहारी वाजेपयी और लालकृष्ण आडवाणी एक ही सुर में ‘फिर सुबह होगी’ गुनगुनाते थे। समय करवट बदलता गया और बीजेपी का कारवां बढ़ता ही चला गया।
1989 में बीजेपी ने जनता दल को समर्थन देकर वीपी सिंह की सरकार भले ही बनवाई हो, पर वह ज्यादा दिन नहीं चल पाई। लेकिन बीजेपी ने यह संदेश कांग्रेस को जरूर दिया कि गैर कांग्रेसी सरकार बनाना मुश्किल नहीं है। एक दौर ऐसा भी था जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री और लालकृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री बनाया गया। 2004 के आम चुनाव भले ही वाजपेयी के नाम पर लड़ा जा रहा था, लेकिन आडवाणी ने ‘इंडिया शाइनिंग’ के नारे को लेकर भारत उदय यात्रा निकाली और उसका उल्टा परिणाम भी सामने आया। बस यहीं से आडवाणी का ग्राफ नीचे गिरना शुरू हो गया। 2005 में आडवाणी ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्यूलर कहा ही था कि बीजेपी और संघ में भूचाल आ गया । जो संघ कल तक आडवाणी को पलकों पर बैठाता था, वही संघ आडवाणी की जान का दुश्मन बन गया। जिन लोगों को आडवाणी ने पार्टी में खड़ा किया था, अब वही उनसे सवाल कर रहे थे। पार्टी संसदीय दल की मीटिंग में उनसे इस्तीफा तक मांग लिया गया और वो इस्तीफा देने को तैयार भी हो गए थे। उन्होने अपनी विदाई के समय चेन्नई में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अपने भाषण में कहा था, ‘अब समय आ गया है कि बीजेपी को अपने रिश्ते संघ से कैसे रखने चाहिए, इस पर पुनर्विचार करना चाहिए।’ ये आडवाणी की संघ को सीधी चुनौती थी। अब संघ के नेताओं की ऑखों में आडवाणी खटकने लगे थे। संघ चाहता था कि अब उन्हें राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए। लेकिन आडवाणी तो कुछ और ही चाहते थे।
आडवाणी 2009 के आम चुनाव में बीजेपी के ही नहीं, एनडीए के भी ‘पीएम इन वेंटिग’ हो गए। 2009 के चुनाव में बीजोपी को 2004 से भी बडी हार का सामना करना पडा। इस हार के बाद आडवाणी लोकसभा में नेता विपक्ष नहीं बनना चाहते थे। उनके इस फैसले से संघ भी खुश था, अपनी टीम के कहने पर वह फिर से नेता विपक्ष बनने को तैयार हो गए। लेकिन 18 दिसम्बर 2009 को उनको संघ के दबाव के बाद लोकसभा में नेता विपक्ष के पद से हटना पड़ा था। आडवाणी यहीं से और ज्यादा कमजोर हो गए।
झारखंड में बीजेपी और जेएमएम की गठबंधन सरकार बने, आडवाणी इसके खिलाफ थे। लेकिन पार्टी और नितिन गडकरी ने उनकी एक न सुनी। बस फिर हर कदम पर संघ ने गडकरी के जरिए आडवाणी को हशिए पर डालने की कोशिश की और संघ इसमें सफल भी हुआ। ऐसे कई मौके आए, जब पार्टी में कई बड़े फैसले लिए गए और आडवाणी को भनक तक नहीं लगी। अब आडवाणी को लगने लगा था कि वो पार्टी में अलग-थलग पड़ गए हैं। आडवाणी चाहते थे कि येदियुरप्पा पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो येदियुरप्पा को कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से हटाया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और उसके के बाद येदियुरप्पा ने आडवाणी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया तो पार्टी ने इस पर ऑखें मूंद ली।
मुम्बई कार्यकारणी से पहले ही गडकरी को दूसरी बार बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जाए, इसको लेकर संघ ने पूरी कवायद की। आडवाणी की नाराजगी के बावजूद संघ ने गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाने के लिए बीजेपी के संविधान में बदलाव कराया। आडवाणी अब इतने कमजोर हो गए है कि संघ के दबाव में गडकरी को दूसरी बार अध्यक्ष बनाए जाने के लिए भी तैयार हो गए। जब बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी पर अपनी कम्पनी के जरिए हेराफेरी के आरोप लगे तो आडवाणी संघ के दबाव में इतने आ गए कि वह संघ के कहने पर न केवल गडकरी के साथ खडे़ हुए, बल्कि उनके समर्थन में एक बयान भी दे दिया।
आडवाणी की हालत ये है कि संघ दबाव डालकर उनसे भ्रष्टाचार पर किसी के समर्थन में भी बयान दिलाता है। सच में अब वो आडवाणी कहीं खो गए हैं, जिन्होने हवाला केस में आरोप लगने मात्र से संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। अब लगता है, आडवाणी सिर्फ शो-पीस बनकर रह गए हैं। एक पुरानी कहावत है कि जैसे घर के बाहर चौखट पर बैठी बूढ़ी मौसी को हर कोई आता जाता नमस्कार तो करता है, लेकिन कहा नहीं मानता ; वैसे ही आडवाणी को पार्टी में व्यक्तिगत तौर पर सम्मान तो प्राप्त है, किंतु आधिकारिक तौर पर अब वह हाशिए पर डाल दिए गए हैं।